ताज्जुब है
की महंगे अल्फ़ाज़ है और सस्ते जज्बात है
बिकती है जवानी कागज़ के चंद टुकड़ो पर
गुजरता है बुढ़ापा जीने की आस पर
कबर की सच्चाई सब जानते है
फिर भी कतराते है मोत की बात पर
बचपन में लोरिया सुला देती थी
अब तो रात गुजराती है
अच्छे ख्वाब की तलाश पर
ताज्जुब है
ज़िन्दगी से क्या मिला वो पता नहीं
लेकिन गुजर गयी कुछ खोने की आस पर
अब जिगर तू इतना बता
इतना तुजे ताज्जुब किस बात पर
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